हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम को मछली वाला नबी कहा जाता है,
जो अपनी क़ौम को अल्लाह की राह पर लाने के प्रयास और उनके
धैर्य व दुआ के कारण बच गए।
हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम अल्लाह के पैग़म्बर थे, जिन्हें इराक के नैनवा शहर की क़ौम को अल्लाह का मार्ग दिखाने और बुतपरस्ती से रोकने के लिए भेजा गया । उन्होंने अपनी क़ौम को केवल एक ही अल्लाह की इबादत करने और बुतों को छोड़ने के लिए प्रेरित किया, लेकिन क़ौम उनकी बात नहीं मानी। निराश होकर हज़रत यूनुस ने शहर छोड़ने का फैसला किया और एक कश्ती में चढ़ गए
कश्ती बीच नदी में पहुँचने पर डूबने लगी। समुद्री मल्लाहों ने सुझाव दिया
कि किसी भागे हुए व्यक्ति को पानी में फेंक दिया जाए। हज़रत यूनुस ने
स्वयं अपने आप को पानी में डाल दिया, और उस समय एक बड़ी
मछली ने उन्हें निगल लिया
। मछली का पेट अल्लाह की शक्ति से सुरक्षित और पारदर्शी बना दिया गया
ताकि वे 40 दिन तक जीवित रह सकें और उस दौरान अल्लाह की तस्बीह कर सकें
मछली के पेट में रहते हुए हज़रत यूनुस ने अत्यन्त दिल से अल्लाह से माफी माँगी और यह दुआ पढ़ी: "لا إِلٰهَ إِلَّا أَنْتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنْتُ مِنَ الظَّالِمِينَ" (तेरे सिवा कोई पूज्य नहीं, महिमावान है तू, निःसंदेह मैं अत्याचारियों में से रहा हूँ) । इस दुआ और उनकी सच्ची तौबा के कारण अल्लाह ने मछली को आदेश दिया कि हज़रत यूनुस को किनारे उगल दिया जाए। उन्होंने 40 दिन बाद मछली से बाहर आए और अल्लाह ने उनके लिए भोजन और छाया की व्यवस्था की, जिससे उनकी सेहत सुधरी और वे क़ौम के पास लौट सके
हज़रत यूनुस के शहर लौटने से पहले क़ौम ने अल्लाह से सच्चे दिल से तौबा की और इस्लाम स्वीकार किया। इसके बाद नबी ने अपने शहर में फिर से अल्लाह के नाम का प्रचार किया और सभी लोगों को बुतपूजा छोड़कर केवल अल्लाह की इबादत करने का मार्ग दिखाया
हज़रत यूनुस की कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि असफलताओं या कठिनाइयों में धैर्य, अल्लाह पर भरोसा और सच्ची दुआ से बचाव संभव है। उनकी दुआ आज भी मुसलमानों के लिए प्रेरणास्त्रोत है और किसी भी कठिनाई में अल्लाह से मदद माँगने का मार्ग दिखाती है